| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल » श्लोक 327-328 |
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| | | | श्लोक 1.2.327-328  | राजभिर्वेदितव्यास्ते सम्यग्ज्ञानबुभुत्सुभि:।
आपद्धर्माश्च तत्रैव कालहेतुप्रदर्शिन:॥ ३२७॥
यान् बुद्ध्वा पुरुष: सम्यक् सर्वज्ञत्वमवाप्नुयात् ।
मोक्षधर्माश्च कथिता विचित्रा बहुविस्तरा:॥ ३२८॥ | | | | | | अनुवाद | | परम ज्ञान की इच्छा रखने वाले राजाओं को इन्हें भली-भाँति जानना चाहिए। इसी पर्व में देश और काल के अनुसार, समय और हेतु के अनुसार आचरण करने योग्य आपद्धर्मों का भी वर्णन किया गया है। इन्हें भली-भाँति जानने पर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है। शान्ति पर्व में विविध अद्भुत मोक्ष-धर्मों का भी विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया गया है। ॥327-328॥ | | | | Kings who desire supreme knowledge should know them well. In the same Parva, the Apaddharma (duties) which are to be applied according to the place and time, depending upon the time and reason, have also been described. On knowing them well, a man becomes omniscient. In Shanti Parva, various and wonderful Moksha-dharmas have also been propounded in great detail. ॥327-328॥ | | ✨ ai-generated | | |
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