श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 325-326
 
 
श्लोक  1.2.325-326 
अत: परं शान्तिपर्व द्वादशं बुद्धिवर्धनम्।
यत्र निर्वेदमापन्नो धर्मराजो युधिष्ठिर:॥ ३२५॥
घातयित्वा पितॄन् भ्रातॄन् पुत्रान् सम्बन्धिमातुलान्।
शान्तिपर्वणि धर्माश्च व्याख्याता: शारतल्पिका:॥ ३२६॥
 
 
अनुवाद
स्त्रीपर्व के बाद बारहवाँ पर्व शांतिपर्व के नाम से प्रसिद्ध है। यह बुद्धि और विवेक को बढ़ाने वाला है। इस पर्व में कहा गया है कि अपने पितातुल्य गुरुजनों, भाइयों, पुत्रों, सम्बन्धियों और मामाओं आदि को मरवाकर राजा युधिष्ठिर मन में अत्यन्त दुःखी (शोक और वैराग्य) हो गए। शांतिपर्व में बाँस की शय्या पर शयन करने वाले भीष्मजी द्वारा उपदेशित धर्मों का वर्णन है। 325-326॥
 
The twelfth festival after Stree Parva is famous by the name of Shanti Parva. It enhances intelligence and wisdom. In this festival it is said that after getting his fatherly teachers, brothers, sons, relatives and maternal uncles etc. killed, King Yudhishthir became very sad (sorrow and renunciation) in his mind. There is a description of the religions preached by Bhishmaji, who slept on the bamboo bed during Shanti Parva. 325-326॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)