श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 201
 
 
श्लोक  1.2.201 
सावित्र्याश्चाप्युपाख्यानमत्रैव परिकीर्तितम्।
कर्णस्य परिमोक्षोऽत्र कुण्डलाभ्यां पुरन्दरात्॥ २०१॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद सावित्री की कथा और इन्द्र द्वारा कर्ण के कुण्डल छीन लेने की कथा है ॥201॥
 
After this there is the story of Savitri and the tale of Indra depriving Karna of his earrings. ॥ 201॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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