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श्लोक  1.2.198 
दुर्वाससोऽप्युपाख्यानमत्रैव परिकीर्तितम्।
जयद्रथेनापहारो द्रौपद्याश्चाश्रमान्तरात्॥ १९८॥
 
 
अनुवाद
इसमें दुर्वासाजी तथा जयद्रथ द्वारा आश्रम से द्रौपदी के हरण की कथा भी वर्णित है।198.
 
In this the story of Durvasaji and the abduction of Draupadi from the ashram by Jayadrath is also narrated. 198.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)