श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 180-182
 
 
श्लोक  1.2.180-182 
जटासुरस्य च वधो राक्षसस्य वृकोदरात् ।
वृषपर्वणश्च राजर्षेस्ततोऽभिगमनं स्मृतम्॥ १८०॥
आर्ष्टिषेणाश्रमे चैषां गमनं वास एव च।
प्रोत्साहनं च पाञ्चाल्या भीमस्यात्र महात्मन:॥ १८१॥
कैलासारोहणं प्रोक्तं यत्र यक्षैर्बलोत्कटै:।
युद्धमासीन्महाघोरं मणिमत्प्रमुखै: सह॥ १८२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् भीमसेन ने जटासुर नामक राक्षस का वध कर दिया। फिर पाण्डव क्रमशः वृषपर्वा तथा आर्ष्टिषेण नामक ऋषियों के आश्रमों में जाकर रहने लगे। इधर द्रौपदी महात्मा भीमसेन का उत्साहवर्धन करती रहती थीं। भीमसेन कैलाश पर्वत पर चढ़ गए। यहाँ अपने बल के मद में मदमस्त होकर उन्होंने मणिमान आदि यक्षों के साथ अत्यन्त भयंकर युद्ध किया ॥180-182॥
 
After that, the demon Jatasur was killed by Bhimsen. Then the Pandavas went to the ashrams of sages Vrishparva and Arshtishen respectively and started living there. Here Draupadi kept encouraging Mahatma Bhimsen. Bhimsen climbed Mount Kailash. Here, intoxicated with his power, he had a very fierce battle with the Yakshas like Maniman etc. 180-182॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)