श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 167
 
 
श्लोक  1.2.167 
आगस्त्यमपि चाख्यानं यत्र वातापिभक्षणम्।
लोपामुद्राभिगमनमपत्यार्थमृषेस्तथा॥ १६७॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद अगस्त्यचरित्र आता है, जिसमें उनके द्वारा वायुभक्षण तथा सन्तान प्राप्ति हेतु लोपामुद्रा के साथ समागम का वर्णन है ॥167॥
 
After this comes Agastya-charitra, in which his eating of the wind and his intercourse with Lopamudra for begetting a child is described.॥ 167॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)