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mahabharat 1.2.165-166: इसके बाद महर्षि नारद ने पुलस्त्यतीर्थकी यात्रा करनेकी प्रेरणा दी और महात्मा पाण्डवोंने वहाँ यात्रा की। यहीं पर इन्द्रद्वारा कर्णके कुण्डल हरण करने तथा राजा गयके यज्ञकी महिमाका वर्णन किया गया है। 165-166॥   |   mahabharat अध्याय 1.2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 165-166
 
 
श्लोक  1.2.165-166 
पुलस्त्यतीर्थयात्रा च नारदेन महर्षिणा।
तीर्थयात्रा च तत्रैव पाण्डवानां महात्मनाम्॥ १६५॥
कर्णस्य परिमोक्षोऽत्र कुण्डलाभ्यां पुरन्दरात् ।
तथा यज्ञविभूतिश्च गयस्यात्र प्रकीर्तिता॥ १६६॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद महर्षि नारद ने पुलस्त्यतीर्थकी यात्रा करनेकी प्रेरणा दी और महात्मा पाण्डवोंने वहाँ यात्रा की। यहीं पर इन्द्रद्वारा कर्णके कुण्डल हरण करने तथा राजा गयके यज्ञकी महिमाका वर्णन किया गया है। 165-166॥
 
After this, Maharishi Narad inspired to travel to Pulastyatirtha and Mahatma Pandavas traveled there. It is here that Indra's depriving Karna of his earrings and the glory of King Gaya's yagya have been described. 165-166॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)