श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 161
 
 
श्लोक  1.2.161 
नलोपाख्यानमत्रैव धर्मिष्ठं करुणोदयम्।
दमयन्त्या: स्थितिर्यत्र नलस्य चरितं तथा॥ १६१॥
 
 
अनुवाद
इसी संदर्भ में नलोपाख्यान आता है, जो धार्मिक भक्ति का अद्वितीय उदाहरण है और जिसे पढ़कर तथा सुनकर हृदय में करुणा की धारा प्रवाहित होने लगती है। दमयंती का दृढ़ धैर्य और नल का चरित्र यहाँ पढ़ा जा सकता है। 161.
 
In this context comes the Nalopakhyana, which is a unique example of religious devotion and after reading and listening to which a stream of compassion starts flowing in the heart. Damayanti's firm patience and Nala's character can be read here. 161.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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