श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 160
 
 
श्लोक  1.2.160 
दर्शनं बृहदश्वस्य महर्षेर्भावितात्मन:।
युधिष्ठिरस्य चार्तस्य व्यसनं परिदेवनम्॥ १६०॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर ने शुद्धहृदय महर्षि बृहदश्व को देखा। युधिष्ठिर दुःखी हुए और उनसे अपनी दुःख कथा कहकर विलाप करने लगे॥160॥
 
After this, Dharmaraja Yudhishthira saw the pure-hearted Maharishi Brihadashwa. Yudhishthira became sad and told him his tale of sorrow and lamented.॥ 160॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)