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mahabharat 1.199.d20: अर्जुन की वाणी मधुर वचन बोलने वाली है, वह कभी भी अनुचित, आसक्तियुक्त, मिथ्या और अप्रिय वचन नहीं बोलती।   |   mahabharat अध्याय 1.199: पाण्डवोंके विवाहसे दुर्योधन आदिकी चिन्ता, धृतराष्ट्रका पाण्डवोंके प्रति प्रेमका दिखावा और दुर्योधनकी कुमन्त्रणा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 199: पाण्डवोंके विवाहसे दुर्योधन आदिकी चिन्ता, धृतराष्ट्रका पाण्डवोंके प्रति प्रेमका दिखावा और दुर्योधनकी कुमन्त्रणा  »  श्लोक d20
 
 
श्लोक  1.199.d20 
न ह्ययुक्तं न चासक्तं नानृतं न च विप्रियम्।
भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य भारती॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन की वाणी मधुर वचन बोलने वाली है, वह कभी भी अनुचित, आसक्तियुक्त, मिथ्या और अप्रिय वचन नहीं बोलती।
 
The voice of Arjuna, who speaks pleasant words, never speaks words which are unreasonable, attachment-filled, false and unpleasant.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)