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mahabharat 1.199.12: "मैं मानता हूँ कि भाग्य ही सबसे बलवान है, मनुष्य का प्रयास व्यर्थ है। पिताजी! हमारे प्रयासों पर धिक्कार है, जबकि पाण्डव अभी जीवित हैं।" ॥12॥   |   mahabharat अध्याय 1.199: पाण्डवोंके विवाहसे दुर्योधन आदिकी चिन्ता, धृतराष्ट्रका पाण्डवोंके प्रति प्रेमका दिखावा और दुर्योधनकी कुमन्त्रणा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 199: पाण्डवोंके विवाहसे दुर्योधन आदिकी चिन्ता, धृतराष्ट्रका पाण्डवोंके प्रति प्रेमका दिखावा और दुर्योधनकी कुमन्त्रणा  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.199.12 
दैवं च परमं मन्ये पौरुषं चाप्यनर्थकम्।
धिगस्तु पौरुषं तात ध्रियन्ते यत्र पाण्डवा:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
"मैं मानता हूँ कि भाग्य ही सबसे बलवान है, मनुष्य का प्रयास व्यर्थ है। पिताजी! हमारे प्रयासों पर धिक्कार है, जबकि पाण्डव अभी जीवित हैं।" ॥12॥
 
"I believe that destiny is the strongest, man's efforts are futile. Father! Shame on our efforts, when the Pandavas are still alive." ॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)