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श्लोक 1.194.33  |
वैशम्पायन उवाच
ते समेत्य तत: सर्वे कथयन्ति स्म भारत।
अथ द्वैपायनो राजन्नभ्यागच्छद् यदृच्छया॥ ३३॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - हे भारत! तत्पश्चात् वे सब लोग मिलकर इस विषय में परामर्श करने लगे। राजन! उसी समय भगवान वेदव्यास वहाँ अचानक आ पहुँचे। 33॥ |
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| Vaishampayanji says- India! Thereafter all of them together started consulting on this matter. Rajan! At this time Lord Vedvyas suddenly arrived there. 33॥ |
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि द्वैपायनागमने चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १९४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें वेदव्यासके आगमनसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९४॥
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