श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 194: द्रुपद और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा व्यासजीका आगमन  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  1.194.1-3 
वैशम्पायन उवाच
तत आहूय पाञ्चाल्यो राजपुत्रं युधिष्ठिरम्।
परिग्रहेण ब्राह्मेण परिगृह्य महाद्युति:॥ १॥
पर्यपृच्छददीनात्मा कुन्तीपुत्रं सुवर्चसम्।
कथं जानीम भवत: क्षत्रियान् ब्राह्मणानुत॥ २॥
वैश्यान् वा गुणसम्पन्नानथवा शूद्रयोनिजान्।
मायामास्थाय वा विप्रांश्चरत: सर्वतोदिशम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात्, अत्यंत तेजस्वी, उदारचित्त राजा द्रुपद ने महातेजस्वी कुन्तीपुत्र राजकुमार युधिष्ठिर को बुलाकर ब्राह्मण के सत्कार से उनका स्वागत किया और पूछा - 'हम कैसे जानें कि आप किस वर्ण के हैं? क्या हम आपको क्षत्रिय, ब्राह्मण, सदाचारी वैश्य या शूद्र मानें? अथवा आप लोगों को, जो माया का आश्रय लेकर ब्राह्मण रूप धारण करके सब दिशाओं में विचरण करते हैं, कोई देवता मानें? 1-3॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, Drupada, the very brilliant, generous minded king of Panchala, called Prince Yudhishthira, the son of Kunti, who was very bright, and accepted him with the hospitality of a Brahmin and asked – 'How do we know to which caste you belong? Should we consider you a Kshatriya, a Brahmin, a virtuous Vaishya or a Shudra? Or should we consider you people who, taking shelter of Maya and wandering in all directions in the form of Brahmins, are some gods? 1-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)