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mahabharat 1.190.25: ‘हमारे हृदय में जो कल्याणभाव छिपा है, उसे आप प्राप्त करें। आप सब लोग प्रज्वलित अग्नि के समान आगे बढ़ते रहें। अब कोई भी राजा आप सबको पहचान न सके, इसलिए हम लोग भी अपने शिविर में लौट चलें।’ ऐसा कहकर, युधिष्ठिर की अनुमति लेकर, अक्षय तेज से युक्त भगवान श्रीकृष्ण बलदेवजी के साथ शीघ्र ही वहाँ से चले गए॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 1.190: कुन्ती, अर्जुन और युधिष्ठिरकी बातचीत, पाँचों पाण्डवोंका द्रौपदीके साथ विवाहका विचार तथा बलराम और श्रीकृष्णकी पाण्डवोंसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 190: कुन्ती, अर्जुन और युधिष्ठिरकी बातचीत, पाँचों पाण्डवोंका द्रौपदीके साथ विवाहका विचार तथा बलराम और श्रीकृष्णकी पाण्डवोंसे भेंट  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.190.25 
भद्रं वोऽस्तु निहितं यद् गुहायां
विवर्धध्वं ज्वलना इवैधमाना:।
मा वो विदु: पार्थिवा: केचिदेव
यास्यावहे शिविरायैव तावत्॥
सोऽनुज्ञात: पाण्डवेनाव्ययश्री:
प्रायाच्छीघ्रं बलदेवेन सार्धम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
‘हमारे हृदय में जो कल्याणभाव छिपा है, उसे आप प्राप्त करें। आप सब लोग प्रज्वलित अग्नि के समान आगे बढ़ते रहें। अब कोई भी राजा आप सबको पहचान न सके, इसलिए हम लोग भी अपने शिविर में लौट चलें।’ ऐसा कहकर, युधिष्ठिर की अनुमति लेकर, अक्षय तेज से युक्त भगवान श्रीकृष्ण बलदेवजी के साथ शीघ्र ही वहाँ से चले गए॥ 25॥
 
'May you attain the feeling of well-being that is hidden in our hearts. May you all keep progressing like a blazing fire. Now no king should be able to recognize you all, so we too will return to our camp.' Saying this, taking Yudhishthira's permission, Lord Krishna, endowed with inexhaustible splendor, quickly left from there along with Baldevji.॥ 25॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि रामकृष्णागमने नवत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १९०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें बलराम और श्रीकृष्णका आगमनविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)