Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.190.17: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! उस समय अपने बड़े भाई के ये वचन सुनकर उदार हृदय वाले सभी पाण्डव मन में ऐसा ही विचार करते हुए शान्त भाव से बैठ गए॥17॥   |   mahabharat अध्याय 1.190: कुन्ती, अर्जुन और युधिष्ठिरकी बातचीत, पाँचों पाण्डवोंका द्रौपदीके साथ विवाहका विचार तथा बलराम और श्रीकृष्णकी पाण्डवोंसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 190: कुन्ती, अर्जुन और युधिष्ठिरकी बातचीत, पाँचों पाण्डवोंका द्रौपदीके साथ विवाहका विचार तथा बलराम और श्रीकृष्णकी पाण्डवोंसे भेंट  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.190.17 
वैशम्पायन उवाच
भ्रातुर्वचस्तत् प्रसमीक्ष्य सर्वे
ज्येष्ठस्य पाण्डोस्तनयास्तदानीम्।
तमेवार्थं ध्यायमाना मनोभि:
सर्वे च ते तस्थुरदीनसत्त्वा:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! उस समय अपने बड़े भाई के ये वचन सुनकर उदार हृदय वाले सभी पाण्डव मन में ऐसा ही विचार करते हुए शान्त भाव से बैठ गए॥17॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! At that time, having heard these words of their elder brother, all the generous-hearted Pandavas sat quietly, thinking about the same thing in their minds.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)