श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 19: देवताओंका अमृतपान, देवासुरसंग्राम तथा देवताओंकी विजय  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.19.31 
ततोऽमृतं सुनिहितमेव चक्रिरे
सुरा: परां मुदमभिगम्य पुष्कलाम्।
ददौ च तं निधिममृतस्य रक्षितुं
किरीटिने बलभिदथामरै: सह॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
इस विजय से देवतागण अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने उस अमृत को बड़ी कुशलता से सुरक्षित रखा। इन्द्र ने अमृत का वह भण्डार रक्षार्थ मुकुटधारी नरकासुर को सौंप दिया। 31॥
 
The gods were greatly pleased with this victory. He kept that nectar very well. Indra along with the immortals handed over that treasure of nectar to the crowned Lord Naraka for protection. 31॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि अमृतमन्थनसमाप्तिर्नामैकोनविंशोऽध्याय:॥ १९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें अमृतमन्थन-समाप्ति नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)