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mahabharat 1.188.17: तब कुन्तीक के शत्रु भीमसेन, जिनकी भुजाएँ मोटी और विशाल थीं, उसी वृक्ष को हाथ में लेकर भयंकर दण्ड धारण करते हुए यमराज के समान परम श्रेष्ठ अर्जुन के पास खड़े हो गए॥17॥   |   mahabharat अध्याय 1.188: द्रुपदको मारनेके लिये उद्यत हुए राजाओंका सामना करनेके लिये भीम और अर्जुनका उद्यत होना और उनके विषयमें भगवान् श्रीकृष्णका बलरामजीसे वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 188: द्रुपदको मारनेके लिये उद्यत हुए राजाओंका सामना करनेके लिये भीम और अर्जुनका उद्यत होना और उनके विषयमें भगवान् श्रीकृष्णका बलरामजीसे वार्तालाप  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.188.17 
तं वृक्षमादाय रिपुप्रमाथी
दण्डीव दण्डं पितृराज उग्रम्।
तस्थौ समीपे पुरुषर्षभस्य
पार्थस्य पार्थ: पृथुदीर्घबाहु:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तब कुन्तीक के शत्रु भीमसेन, जिनकी भुजाएँ मोटी और विशाल थीं, उसी वृक्ष को हाथ में लेकर भयंकर दण्ड धारण करते हुए यमराज के समान परम श्रेष्ठ अर्जुन के पास खड़े हो गए॥17॥
 
Then Bhimsen, the enemy of Kuntika, having thick and huge arms, took the same tree in his hand and stood near the most supreme Arjuna, like Yamraj, wielding a fierce rod. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)