श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 187: अर्जुनका लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको प्राप्त करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.187.7 
यद्येष दर्पाद्धर्षाद् वाप्यथ ब्राह्मणचापलात्।
प्रस्थितो धनुरायन्तुं वार्यतां साधु मा गमत्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
यदि वह अभिमान, हर्ष या ब्राह्मण-भाव से धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए आगे बढ़ा हो, तो उसे रोक देना चाहिए; वह न ही जाए तो अच्छा है। ॥7॥
 
"If he has moved forward to string the bow out of pride, joy or brahminical restlessness, he should be stopped; it would be better if he does not go at all." ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)