Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.187.11-14: उसमें बल और महान उत्साह है। यदि वह असमर्थ होता, तो स्वयं धनुष के पास जाने का साहस न कर सकता था। समस्त लोकों में देवता, दानव आदि रूप में विचरण करने वाले मनुष्यों का ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो ब्राह्मणों के लिए असम्भव हो। ब्राह्मण जल पीकर, वायु पीकर अथवा फल खाकर भी कठोर व्रत का पालन करते हैं। इसलिए शरीर से दुबले-पतले होते हुए भी वे अपने तेज के कारण अत्यन्त बलवान होते हैं। ब्राह्मण को जो भी काम मिलता है, अच्छा या बुरा, सुखद या दुखद, छोटा या बड़ा, वह करता है; इसलिए कोई भी काम करते समय उस ब्राह्मण का अपमान नहीं करना चाहिए। मैं संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं देखता, जो धनुर्वेद, वेद और नाना प्रकार के योग में ब्राह्मण से बढ़कर हो। एक श्रेष्ठ ब्राह्मण मन्त्रबल, योगबल अथवा महान आत्मबल से इस सम्पूर्ण जगत को अचम्भित कर सकता है। (इसलिए उनके प्रति अनादर नहीं करना चाहिए।) देखो, जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने युद्ध में अकेले ही (सभी) क्षत्रियों को परास्त कर दिया। | mahabharat अध्याय 1.187: अर्जुनका लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको प्राप्त करना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
शक्तिरस्य महोत्साहा न ह्यशक्त: स्वयं व्रजेत्।
न च तद् विद्यते किंचित् कर्म लोकेषु यद् भवेत्॥ ११॥
ब्राह्मणानामसाध्यं च नृषु संस्थानचारिषु।
अब्भक्षा वायुभक्षाश्च फलाहारा दृढव्रता:॥ १२॥
दुर्बला अपि विप्रा हि बलीयांस: स्वतेजसा।
ब्राह्मणो नावमन्तव्य: सदसद् वा समाचरन्॥ १३॥
सुखं दु:खं महद् ह्रस्वं कर्म यत् समुपागतम्।
(धनुर्वेदे च वेदे च योगेषु विविधेषु च।
न तं पश्यामि मेदिन्यां ब्राह्मणाभ्यधिको भवेत्॥
मन्त्रयोगबलेनापि महताऽऽत्मबलेन वा।
जृम्भयेयुरमुं लोकमथवा द्विजसत्तमा:॥ )
जामदग्न्येन रामेण निर्जिता: क्षत्रिया युधि॥ १४॥
अनुवाद
उसमें बल और महान उत्साह है। यदि वह असमर्थ होता, तो स्वयं धनुष के पास जाने का साहस न कर सकता था। समस्त लोकों में देवता, दानव आदि रूप में विचरण करने वाले मनुष्यों का ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो ब्राह्मणों के लिए असम्भव हो। ब्राह्मण जल पीकर, वायु पीकर अथवा फल खाकर भी कठोर व्रत का पालन करते हैं। इसलिए शरीर से दुबले-पतले होते हुए भी वे अपने तेज के कारण अत्यन्त बलवान होते हैं। ब्राह्मण को जो भी काम मिलता है, अच्छा या बुरा, सुखद या दुखद, छोटा या बड़ा, वह करता है; इसलिए कोई भी काम करते समय उस ब्राह्मण का अपमान नहीं करना चाहिए। मैं संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं देखता, जो धनुर्वेद, वेद और नाना प्रकार के योग में ब्राह्मण से बढ़कर हो। एक श्रेष्ठ ब्राह्मण मन्त्रबल, योगबल अथवा महान आत्मबल से इस सम्पूर्ण जगत को अचम्भित कर सकता है। (इसलिए उनके प्रति अनादर नहीं करना चाहिए।) देखो, जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने युद्ध में अकेले ही (सभी) क्षत्रियों को परास्त कर दिया।
There is power and great enthusiasm in him. If he was incapable, he would not have dared to go near the bow himself. There is no such task of the men roaming in the form of gods, demons etc. in all the worlds, which is impossible for Brahmins. Brahmins observe fasts strictly even by drinking water, eating air or eating fruits. Therefore, despite being thin in body, they are very strong due to their brilliance. A Brahmin does whatever work he gets, good or bad, pleasant or sad, small or big; hence, while doing any work, that Brahmin should not be insulted. I do not see any person in the world who is better than a Brahmin in Dhanurveda, Vedas and various types of Yoga. A great Brahmin can stun this entire world with the power of mantra, power of yoga or great self-power. (Therefore one should not be disrespectful towards them.) See, Jamadagni's son Parashurama single-handedly defeated (all) the Kshatriyas in the war.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥