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mahabharat 1.184.33-34: महाराज! जब बाजे की ध्वनि बंद हो गई और स्वयंवर सभा में सन्नाटा छा गया, तब धृष्टद्युम्न रीति के अनुसार द्रौपदी को साथ लेकर मंच के मध्य में खड़े हुए और मेघ और डमरू के समान तथा मेघ की गर्जना के समान गम्भीर वाणी में ये उत्तम एवं मधुर अर्थपूर्ण वचन बोले-॥33-34॥   |   mahabharat अध्याय 1.184: पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 184: पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  1.184.33-34 
नि:शब्दे तु कृते तस्मिन् धृष्टद्युम्नो विशाम्पते।
कृष्णामादाय विधिवन्मेघदुन्दुभिनि:स्वन:॥ ३३॥
रङ्गमध्ये गतस्तत्र मेघगम्भीरया गिरा।
वाक्यमुच्चैर्जगादेदं श्लक्ष्णमर्थवदुत्तमम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
महाराज! जब बाजे की ध्वनि बंद हो गई और स्वयंवर सभा में सन्नाटा छा गया, तब धृष्टद्युम्न रीति के अनुसार द्रौपदी को साथ लेकर मंच के मध्य में खड़े हुए और मेघ और डमरू के समान तथा मेघ की गर्जना के समान गम्भीर वाणी में ये उत्तम एवं मधुर अर्थपूर्ण वचन बोले-॥33-34॥
 
Maharaj! When the sound of musical instruments died down and there was silence in the Swayamvar Sabha, then according to the custom Dhrishtadyumna stood in the middle of the stage taking Draupadi with him and in a voice like that of a cloud and a drum and deep like the thunder of a cloud, spoke these excellent and sweet words full of meaning -॥ 33-34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)