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mahabharat 1.184.31: तब सोमवंशी क्षत्रियों के धर्मपरायण एवं मन्त्रज्ञ ब्राह्मण पुरोहित ने अग्निवेदी के चारों ओर कुशा बिछाकर वैदिक रीति से जलती हुई अग्नि में घी की आहुति दी। 31॥   |   mahabharat अध्याय 1.184: पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 184: पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.184.31 
पुरोहित: सोमकानां मन्त्रविद् ब्राह्मण: शुचि:।
परिस्तीर्य जुहावाग्निमाज्येन विधिवत् तदा॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
तब सोमवंशी क्षत्रियों के धर्मपरायण एवं मन्त्रज्ञ ब्राह्मण पुरोहित ने अग्निवेदी के चारों ओर कुशा बिछाकर वैदिक रीति से जलती हुई अग्नि में घी की आहुति दी। 31॥
 
Then the pious and mantra-wielding Brahmin priest of the Somakvanshi Kshatriyas spread kusha around the fire altar and offered ghee to the burning fire as per the Vedic ritual. 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)