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mahabharat 1.184.2: तत्पश्चात् उन पाण्डवों ने मार्ग में निष्पाप, शुद्धचित्त और महान महात्मा द्वैपायन मुनिक को देखा॥2॥   |   mahabharat अध्याय 1.184: पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 184: पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.184.2 
ततस्ते सुमहात्मानं शुद्धात्मानमकल्मषम्।
ददृशु: पाण्डवा वीरा मुनिं द्वैपायनं तदा॥ २॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उन पाण्डवों ने मार्ग में निष्पाप, शुद्धचित्त और महान महात्मा द्वैपायन मुनिक को देखा॥2॥
 
Thereafter, those Pandavas saw the sinless, pure minded and great Mahatma Dwaipayan Munika on the way. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)