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mahabharat 1.184.17: चारों ओर चारदीवारी और खाइयाँ थीं। अनेक द्वार और दरवाजे उस मंडप की शोभा बढ़ा रहे थे। वह सभा-भवन चारों ओर से विचित्र छतरियों से सुसज्जित था।   |   mahabharat अध्याय 1.184: पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 184: पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.184.17 
प्राकारपरिखोपेतो द्वारतोरणमण्डित:।
वितानेन विचित्रेण सर्वत: समलंकृत:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
चारों ओर चारदीवारी और खाइयाँ थीं। अनेक द्वार और दरवाजे उस मंडप की शोभा बढ़ा रहे थे। वह सभा-भवन चारों ओर से विचित्र छतरियों से सुसज्जित था।
 
There were boundary walls and moats on all sides. Many gates and doors were adding to the beauty of that pavilion. That assembly hall was decorated from all sides with strange canopies.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)