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mahabharat 1.184.14-15: नाना देशों से अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मण भी वहाँ आये हुए थे। महामनस्वी राजा द्रुपद ने वहाँ आये हुए राजाओं का बहुत अच्छी तरह से स्वागत और सेवा की। तत्पश्चात वे सभी राजा स्वयंवर देखने की इच्छा से वहाँ रखे हुए मंचों पर बैठ गए। उस नगर के सभी निवासी भी आकर अपने-अपने स्थानों पर बैठ गए। उन सबका कोलाहल व्याकुल समुद्र के भयंकर गर्जन के समान सुनाई दे रहा था॥ 14-15॥   |   mahabharat अध्याय 1.184: पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 184: पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  1.184.14-15 
ब्राह्मणाश्च महाभागा देशेभ्य: समुपागमन्।
ततोऽर्चिता राजगणा द्रुपदेन महात्मना॥ १४॥
उपोपविष्टा मञ्चेषु द्रष्टुकामा: स्वयंवरम्।
तत: पौरजना: सर्वे सागरोद्‍धूतनि:स्वना:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
नाना देशों से अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मण भी वहाँ आये हुए थे। महामनस्वी राजा द्रुपद ने वहाँ आये हुए राजाओं का बहुत अच्छी तरह से स्वागत और सेवा की। तत्पश्चात वे सभी राजा स्वयंवर देखने की इच्छा से वहाँ रखे हुए मंचों पर बैठ गए। उस नगर के सभी निवासी भी आकर अपने-अपने स्थानों पर बैठ गए। उन सबका कोलाहल व्याकुल समुद्र के भयंकर गर्जन के समान सुनाई दे रहा था॥ 14-15॥
 
Many great Brahmins from different countries had also arrived there. The great-minded King Drupada welcomed and served the kings (who had arrived there) very well. Thereafter all those kings sat on the platforms placed there with the desire to see the swayamvar. All the residents of that city also came and sat in their respective places. The noise of all of them sounded like the terrible roar of an agitated sea.॥ 14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)