अध्याय 184: पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा
श्लोक 1: वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! इन ब्राह्मणों के वचन सुनकर पाण्डव (उनके साथ) दक्षिण पांचाल देश की ओर चले, जिसका पालन-पोषण राजा द्रुपद ने किया था।
श्लोक 2: तत्पश्चात् उन पाण्डवों ने मार्ग में निष्पाप, शुद्धचित्त और महान महात्मा द्वैपायन मुनिक को देखा॥2॥
श्लोक 3: पांडवों ने उनका यथोचित स्वागत किया और उन्होंने भी उनका स्वागत किया। फिर उन्होंने आवश्यक वार्तालाप किया। वार्तालाप समाप्त होने पर, व्यास की अनुमति लेकर पांडव पुनः द्रुपद की राजधानी की ओर चल पड़े।
श्लोक 4: महाबली पाण्डवों ने मार्ग में अनेक सुन्दर वन और सरोवर देखे और धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए प्रत्येक स्थान पर डेरा डाला॥4॥
श्लोक 5: (प्रतिदिन) स्वाध्याय में तत्पर रहने वाले, शुद्धचित्त, मधुर स्वभाव वाले और प्रेमी पाण्डुकुमार इस प्रकार चलते हुए धीरे-धीरे पांचाल देश में पहुँचे ॥5॥
श्लोक 6: द्रुपद के नगर और उसकी सीमा-दीवारों को देखकर पाण्डवों ने उस समय एक कुम्हार के घर में अपने ठहरने की व्यवस्था की।
श्लोक 7: वहाँ ब्राह्मण जीवन का आश्रय लेकर वे भिक्षा माँगते (और उसी से अपना निर्वाह करते) थे। इस प्रकार वहाँ पहुँचे हुए वीर पाण्डवों को कोई भी मनुष्य पहचान नहीं सकता था॥7॥
श्लोक 8: राजा द्रुपद के मन में सदैव यही इच्छा थी कि द्रौपदी का विवाह पाण्डुनन्दन अर्जुन से करें, परन्तु उन्होंने अपनी यह भावना किसी पर प्रकट नहीं की ॥8॥
श्लोक 9: भरत के वंशज जनमेजय! पांचाल के राजा ने कुंतीपुत्र अर्जुन को पाने के लिए एक ऐसा शक्तिशाली धनुष बनाया जिसे कोई और मोड़ नहीं सकता था।
श्लोक 10: राजा ने एक कृत्रिम आकाश-यन्त्र भी बनवाया (जो आकाश में बड़ी तेजी से घूमता रहता था)। उसने उसी आकार का एक लक्ष्य बनवाया और उसे उस यन्त्र के छेद के ऊपर रख दिया। (इसके बाद उसने यह घोषणा की)॥10॥
श्लोक 11: द्रुपद ने घोषणा की, "केवल वही वीर पुरुष मेरी पुत्री को प्राप्त कर सकेगा जो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा और यंत्र के छिद्र से इन प्रस्तुत बाणों से लक्ष्य को भेद देगा।"
श्लोक 12: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब राजा द्रुपद ने इस प्रकार स्वयंवर की घोषणा की, तब उसे सुनकर सब राजा उनकी राजधानी में एकत्र होने लगे॥12॥
श्लोक 13: स्वयंवर देखने के लिए अनेक महान ऋषि-मुनि भी आए थे। महाराज! दुर्योधन जैसे कुरुवंशी नेता भी कर्ण के साथ वहाँ आए थे।
श्लोक 14-15: नाना देशों से अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मण भी वहाँ आये हुए थे। महामनस्वी राजा द्रुपद ने वहाँ आये हुए राजाओं का बहुत अच्छी तरह से स्वागत और सेवा की। तत्पश्चात वे सभी राजा स्वयंवर देखने की इच्छा से वहाँ रखे हुए मंचों पर बैठ गए। उस नगर के सभी निवासी भी आकर अपने-अपने स्थानों पर बैठ गए। उन सबका कोलाहल व्याकुल समुद्र के भयंकर गर्जन के समान सुनाई दे रहा था॥ 14-15॥
श्लोक 16: वहाँ बैठने की व्यवस्था शिशुमार के आकार में सजाई गई थी। शिशुमार के शीर्ष पर सभी राजा अपने-अपने मंच पर बैठे थे। स्वयंवर सभा के लिए मंच नगर के उत्तर-पूर्व कोने में एक सुंदर और समतल भूमि पर सजाया गया था, जो चारों ओर से सुंदर भवनों से घिरा होने के कारण अत्यंत सुंदर लग रहा था।
श्लोक 17: चारों ओर चारदीवारी और खाइयाँ थीं। अनेक द्वार और दरवाजे उस मंडप की शोभा बढ़ा रहे थे। वह सभा-भवन चारों ओर से विचित्र छतरियों से सुसज्जित था।
श्लोक 18: वहाँ सैकड़ों प्रकार के वाद्य बज रहे थे। बहुमूल्य धूप की सुगंध चारों ओर फैल रही थी। फर्श पर चंदन का जल छिड़का हुआ था। चारों ओर पुष्पमालाएँ और मालाएँ लटक रही थीं, जिससे उस स्थान की शोभा बहुत बढ़ रही थी॥18॥
श्लोक 19: उस मंच के चारों ओर कैलाश शिखर के समान ऊँचे, श्वेत रंग के गगनचुम्बी महल थे॥19॥
श्लोक 20: वे अंदर से सोने के जालीदार पर्दों और झालरों से सजे हुए थे। फर्श और दीवारों पर रत्न और कीमती पत्थर जड़े हुए थे। शानदार सीढ़ियाँ बनी थीं जिन पर आराम से चढ़ा जा सकता था। बड़ी-बड़ी चटाईयाँ और बिस्तर आदि बिछाए गए थे।
श्लोक 21: नाना प्रकार की मालाएँ और हार उन भवनों की शोभा बढ़ा रहे थे। अगरबत्ती की सुगंध फैल रही थी। वे हंसों और चन्द्रमा की किरणों के समान श्वेत दिख रहे थे। उनके भीतर से निकल रही धूप की सुगंध एक योजन तक चारों ओर फैल रही थी।
श्लोक 22: उन महलों में सैकड़ों द्वार थे। उनमें प्रवेश-निकास पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था और वे नाना प्रकार के शयन-स्थानों से सुसज्जित थे। उनकी दीवारें अनेक प्रकार की धातुओं के रंगों से रंगी हुई थीं। इसलिए वे महल हिमालय की रंग-बिरंगी चोटियों के समान सुन्दर प्रतीत होते थे।
श्लोक 23: उन्हीं सात महलों या भवनों में, जो अनेक प्रकार से बने हुए थे, सब राजा एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हुए, सबसे सुन्दर वेषभूषा धारण करके बैठे थे।
श्लोक 24-26: जब नगर और जनपद के लोगों ने देखा कि महान् बल और पराक्रम से संपन्न, परम सौभाग्यशाली, कालगुरु के आशीर्वाद से सुशोभित, ब्राह्मणों की महान कृपा से धन्य, अपने-अपने राष्ट्र के रक्षक और अपने शुभ और पुण्य कर्मों के प्रभाव से सम्पूर्ण जगत् के प्रिय, ये महान् राजा पूर्वोक्त विमानों में स्थित बहुमूल्य मंचों पर आकर बैठ गए हैं, तब वे भी राजकुमारी द्रौपदी के दर्शन का लाभ लेने के लिए सभी दिशाओं में जाकर सुखपूर्वक बैठ गए॥24-26॥
श्लोक 27: पाण्डव भी ब्राह्मणों के साथ उसी पंक्ति में बैठकर पांचालराज की उत्तम समृद्धि देख रहे थे॥ 27॥
श्लोक 28: महाराज! नगर में लोगों की भीड़ कई दिनों से बढ़ती जा रही थी। राजसभा बहुत सारा धन और रत्न दान कर रही थी। अनेक अभिनेता और नर्तक अपनी कला का प्रदर्शन करके उस सभा की शोभा बढ़ा रहे थे।
श्लोक 29-30: सोलहवें दिन एक अत्यंत सुन्दर सभा एकत्रित हुई। हे भरतश्रेष्ठ! उस दिन स्नान करके, सुन्दर वस्त्राभूषणों तथा नाना प्रकार के आभूषणों से सुसज्जित होकर, द्रुपद की राजकुमारी हाथों में सुवर्णमयी माला धारण करके युद्धभूमि में आई।
श्लोक 31: तब सोमवंशी क्षत्रियों के धर्मपरायण एवं मन्त्रज्ञ ब्राह्मण पुरोहित ने अग्निवेदी के चारों ओर कुशा बिछाकर वैदिक रीति से जलती हुई अग्नि में घी की आहुति दी। 31॥
श्लोक 32: इस प्रकार अग्निदेव को प्रसन्न करके ब्राह्मणों ने शुभ मन्त्र पढ़े और चारों ओर बज रहे सभी वाद्य बंद हो गए। 32.
श्लोक 33-34: महाराज! जब बाजे की ध्वनि बंद हो गई और स्वयंवर सभा में सन्नाटा छा गया, तब धृष्टद्युम्न रीति के अनुसार द्रौपदी को साथ लेकर मंच के मध्य में खड़े हुए और मेघ और डमरू के समान तथा मेघ की गर्जना के समान गम्भीर वाणी में ये उत्तम एवं मधुर अर्थपूर्ण वचन बोले-॥33-34॥
श्लोक 35: हे देश के राजाओं! जो यहाँ एकत्र हुए हो! तुम सब लोग मेरी बात सुनो। यह धनुष है, ये बाण हैं और यह लक्ष्य है। तुम सब लोग आकाश में छोड़े हुए अपने पाँच तीखे बाणों से उस यंत्र के छिद्र में से लक्ष्य को भेदकर उसे नीचे गिरा दो॥ 35॥
श्लोक 36: "मैं सच कह रहा हूँ, झूठ नहीं बोल रहा हूँ। जो कुलीन कुल का वीर, सुन्दर और बलवान है, जो यह महान कार्य करेगा, आज मेरी बहन कृष्णा उसकी पत्नी बनेगी।"
श्लोक 37: ऐसा कहकर द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न ने वहाँ आये हुए राजाओं के नाम, कुल और पराक्रम का वर्णन करते हुए अपनी बहन द्रौपदी से इस प्रकार कहा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥