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mahabharat 1.181.2: और उत्तम धर्म के ज्ञाता महात्मा महर्षि वशिष्ठ ने यह व्यभिचाररूप पाप कैसे किया? 2॥   |   mahabharat अध्याय 1.181: राजा कल्माषपादको ब्राह्मणी आंगिरसीका शाप   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 181: राजा कल्माषपादको ब्राह्मणी आंगिरसीका शाप  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.181.2 
जानता वै परं धर्मं वसिष्ठेन महात्मना।
अगम्यागमनं कस्मात् कृतं तेन महर्षिणा॥ २॥
 
 
अनुवाद
और उत्तम धर्म के ज्ञाता महात्मा महर्षि वशिष्ठ ने यह व्यभिचाररूप पाप कैसे किया? 2॥
 
And how did Mahatma Maharishi Vashishtha, the expert of the best religion, commit this sin of adultery? 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)