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अध्याय 181: राजा कल्माषपादको ब्राह्मणी आंगिरसीका शाप
 
श्लोक 1:  अर्जुन ने पूछा - गन्धर्वराज! किस कारण को ध्यान में रखकर राजा कल्माषपाद ने अपनी पत्नी को ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ गुरु वसिष्ठजी के पास नियुक्त किया था?॥1॥
 
श्लोक 2:  और उत्तम धर्म के ज्ञाता महात्मा महर्षि वशिष्ठ ने यह व्यभिचाररूप पाप कैसे किया? 2॥
 
श्लोक 3:  हे मित्र! महर्षि वसिष्ठ ने पूर्वकाल में जो पापकर्म किया था, उसका कारण क्या है? यही मेरा संदेह है, जो मैं पूछ रहा हूँ। कृपया मेरे इन सभी संदेहों का निवारण करें॥3॥
 
श्लोक 4:  गंधर्व ने कहा- वीर योद्धा धनंजय! महर्षि वशिष्ठ और राजा मित्रसह के विषय में तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, उसका समाधान सुनो॥4॥
 
श्लोक 5:  भरतश्रेष्ठ! वसिष्ठपुत्र महात्मा शक्ति द्वारा राजा कल्माषपाद को जिस प्रकार शाप दिया गया था, वह सम्पूर्ण कथा मैं आपसे कह चुका हूँ॥5॥
 
श्लोक 6:  शत्रुओं को कष्ट देने वाले राजा कल्माषपाद के शाप से ग्रस्त होकर वह अपनी पत्नी सहित नगर से बाहर गया था। उस समय उसकी आँखें क्रोध से भरी हुई थीं।
 
श्लोक 7:  वह अपनी पत्नी के साथ एक निर्जन वन में गया और वहाँ घूमने लगा। वह विशाल वन विभिन्न प्रकार के हिरणों से भरा हुआ था। उसमें विभिन्न प्रकार के जानवर रहते थे।
 
श्लोक 8:  नाना प्रकार की लताओं और पुष्पों से आच्छादित तथा नाना प्रकार के वृक्षों से आच्छादित वह (गहन) वन भयंकर ध्वनियों से गूंजता रहता था। शापित राजा कल्माषपाद वहाँ विचरण करने लगे॥8॥
 
श्लोक 9-10:  एक दिन भूख से व्याकुल होकर वह अपने लिए भोजन की तलाश में निकल पड़ा। बहुत कष्ट सहने के बाद उसने देखा कि वन के एक निर्जन भाग में एक ब्राह्मण और एक ब्राह्मणी मैथुन हेतु एकत्रित थे। वे अभी तक अपनी कामना पूरी नहीं कर पाए थे कि राक्षस ग्रस्त कल्माषपाद को देखकर वे अत्यन्त भयभीत होकर भाग गए।
 
श्लोक 11:  राजा ने भागते हुए दम्पति के बीच ब्राह्मण को बलपूर्वक पकड़ लिया। अपने पति को राक्षस के हाथों में देखकर ब्राह्मणी बोली-॥11॥
 
श्लोक 12:  हे राजन! मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनो। हे उत्तम व्रतों का पालन करने वाले राजन! तुम सूर्यवंश में उत्पन्न हुए हो। तुम सम्पूर्ण जगत में विख्यात हो।॥12॥
 
श्लोक 13:  'तुम सदैव धर्म में तत्पर रहते हो, बिना किसी प्रमाद के। तुम सदैव अपने गुरुजनों की सेवा में तत्पर रहते हो। हे वीर! यद्यपि इस समय तुम शाप से पीड़ित हो, फिर भी तुम्हें कोई पाप कर्म नहीं करना चाहिए।॥13॥
 
श्लोक 14-15h:  मैं अपने मासिक धर्म के समय में पहुँच गई हूँ, अपने पति के कष्ट से दुःखी हो रही हूँ। मैं संतान प्राप्ति की इच्छा से अपने पति के पास आई थी, किन्तु उनसे मिलकर भी मेरी इच्छा पूरी नहीं हो पाई। हे राजन! ऐसी स्थिति में आप मुझ पर प्रसन्न होकर मेरे पति को मुक्त कर दीजिए।॥14 1/2॥
 
श्लोक 15-21:  इस प्रकार ब्राह्मणी दुःखी होकर विलाप करती हुई गिड़गिड़ा रही थी, परंतु फिर भी जैसे व्याघ्र अपनी इच्छानुसार हिरण को मारकर खा जाता है, उसी प्रकार राजा ने अत्यन्त क्रूर होकर ब्राह्मणी के पति को खा लिया। उस समय क्रोध से पीड़ित ब्राह्मणी के नेत्रों से जो आँसू गिरे, वे प्रज्वलित अग्नि में बदल गए। उस अग्नि ने उस स्थान को जलाकर राख कर दिया। तत्पश्चात, पति के वियोग से व्याकुल और शोकाकुल ब्राह्मणी ने क्रोध में आकर राजा कल्माषपाद को शाप दे दिया- 'हे दुष्ट! अभी तक मेरी पति-कामना पूर्ण नहीं हुई थी, इसीलिए तूने बड़ी क्रूरता से मेरे सामने ही मेरे प्रिय पति, जो अत्यन्त यशस्वी हैं, को खा लिया है। अतः हे मूर्ख! तू भी मेरे शाप से पीड़ित होकर अपनी रजस्वला पत्नी के साथ सहवास करते ही तत्काल मर जाएगा। जिन महर्षि वसिष्ठ के पुत्रों को तूने मारा था, उन्हीं के साथ सहवास करके तेरी पत्नी को पुत्र की प्राप्ति होगी। हे राजन! वह पुत्र तेरे वंश को आगे बढ़ाएगा।'॥ 15-21॥
 
श्लोक 22:  इस प्रकार राजा को शाप देकर वह पतिव्रता एवं साध्वी अंगिरसी स्त्री राजा कल्माषपाद के समीप प्रज्वलित अग्नि में प्रविष्ट हो गई।
 
श्लोक 23:  हे अर्जुन! हे शत्रुओं का संहार करने वाले! महाबली वसिष्ठ जी ने अपनी महान तपस्या और ज्ञानयोग के बल से ये सब बातें जान लीं।
 
श्लोक 24:  बहुत समय बीतने पर जब राजा शाप से मुक्त हो गया, तब वह अपनी रजस्वला पत्नी के पास गया। परन्तु उसकी रानी मदयन्ती ने उसे (शाप का स्मरण कराकर) रोक दिया॥ 24॥
 
श्लोक 25:  राजा कल्माषपाद काम से मोहित हो रहे थे। इसलिए उन्हें शाप की याद नहीं रही। रानी मदयन्ती के वचन सुनकर नृपश्रोष्ठजी को बड़ा मोह हुआ ॥25॥
 
श्लोक 26:  उस शाप को बार-बार याद करके वह अत्यन्त दुःखी हो गया। हे राजन! इसी कारण शाप से पीड़ित राजा कल्माषपाद ने महर्षि वशिष्ठ से अपनी पत्नी के साथ सहवास करवाया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)