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mahabharat 1.180.8: तदनन्तर उस यज्ञ को अन्य लोगों के लिए रोकना अत्यन्त कठिन जानकर उदारचित्त महर्षि अत्रि स्वयं उस यज्ञ को समाप्त करने की इच्छा से पराशर के पास आये॥8॥   |   mahabharat अध्याय 1.180: पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 180: पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.180.8 
तत: परमदुष्प्रापमन्यैर्ऋषिरुदारधी:।
समापिपयिषु: सत्रं तमत्रि: समुपागमत्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर उस यज्ञ को अन्य लोगों के लिए रोकना अत्यन्त कठिन जानकर उदारचित्त महर्षि अत्रि स्वयं उस यज्ञ को समाप्त करने की इच्छा से पराशर के पास आये॥8॥
 
Thereafter, considering it very difficult for others to stop that Yagya, the generous minded Maharishi Atri himself came to Parashar with the desire to end that Yagya. 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)