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mahabharat 1.180.5: उस सत्र में तीन प्रज्वलित अग्नियों के सामने महामुनि पराशर चौथी अग्नि के समान चमक रहे थे ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 1.180: पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 180: पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.180.5 
त्रयाणां पावकानां च सत्रे तस्मिन् महामुनि:।
आसीत् पुरस्ताद् दीप्तानां चतुर्थ इव पावक:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उस सत्र में तीन प्रज्वलित अग्नियों के सामने महामुनि पराशर चौथी अग्नि के समान चमक रहे थे ॥5॥
 
In that session, in front of the three burning fires, Mahamuni Parashara was shining like the fourth fire. ॥5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)