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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 180: पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.180.12 
प्रजोच्छेदमिमं मह्यं न हि कर्तुं त्वमर्हसि।
नैष तात द्विजातीनां धर्मो दृष्टस्तपस्विनाम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
‘पुत्र! तुम्हें इस प्रकार मेरी सन्तान का नाश नहीं करना चाहिए। पिताजी! यह हिंसा कभी भी तपस्वी ब्राह्मणों का धर्म नहीं मानी गई है।’
 
‘Son! You should not destroy my progeny in this manner. Father! This violence has never been considered the religion of ascetic Brahmins.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)