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mahabharat 1.180.11: तात! क्या तुम्हारे यज्ञ में कोई विघ्न पड़ा था? पुत्र! क्या तुम इन निरपराध राक्षसों को मारकर प्रसन्न हो रहे हो, जिन्हें तुम्हारे पिता की हत्या का कुछ भी पता नहीं था? 11॥   |   mahabharat अध्याय 1.180: पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 180: पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.180.11 
कच्चित् तातापविघ्नं ते कच्चिन्नन्दसि पुत्रक।
अजानतामदोषाणां सर्वेषां रक्षसां वधात्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
तात! क्या तुम्हारे यज्ञ में कोई विघ्न पड़ा था? पुत्र! क्या तुम इन निरपराध राक्षसों को मारकर प्रसन्न हो रहे हो, जिन्हें तुम्हारे पिता की हत्या का कुछ भी पता नहीं था? 11॥
 
‘Tat! Was there any obstacle in your yagya? Son! Do you feel happy by killing all these innocent demons who knew nothing about your father's murder? 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)