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mahabharat 1.18.43: मन्त्रमूर्ति भगवान महेश्वर ने उस विष को पीकर अपने कंठ में धारण कर लिया। तब से महादेवजी नीलकंठ नाम से प्रसिद्ध हुए, ऐसी जनश्रुति है॥43॥   |   mahabharat अध्याय 1.18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.18.43 
दधार भगवान् कण्ठे मन्त्रमूर्तिर्महेश्वर:।
तदाप्रभृति देवस्तु नीलकण्ठ इति श्रुति:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
मन्त्रमूर्ति भगवान महेश्वर ने उस विष को पीकर अपने कंठ में धारण कर लिया। तब से महादेवजी नीलकंठ नाम से प्रसिद्ध हुए, ऐसी जनश्रुति है॥43॥
 
Mantramurti Lord Maheshwar drank the poison and took it in his throat. Since then Mahadevji became famous by the name of Neelkanth, such is the rumor. 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)