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mahabharat 1.18.42: उस विष की गंध पाते ही तीनों लोकों के प्राणी अचेत हो गए। तब ब्रह्माजी की प्रार्थना पर भगवान श्री शंकर ने त्रिलोकी की रक्षा के लिए उस महाविष को पी लिया॥42॥   |   mahabharat अध्याय 1.18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  1.18.42 
त्रैलोक्यं मोहितं यस्य गन्धमाघ्राय तद् विषम्।
प्राग्रसल्लोकरक्षार्थं ब्रह्मणो वचनाच्छिव:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
उस विष की गंध पाते ही तीनों लोकों के प्राणी अचेत हो गए। तब ब्रह्माजी की प्रार्थना पर भगवान श्री शंकर ने त्रिलोकी की रक्षा के लिए उस महाविष को पी लिया॥42॥
 
As soon as they smelled the smell of that poison, the creatures of the three worlds became unconscious. Then, on the prayer of Brahmaji, Lord Shri Shankar drank that great poison to save Triloki. 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)