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mahabharat 1.18.29-30: तब देवताओं ने वहाँ बैठे हुए वरदाता ब्रह्माजी से कहा - 'ब्रह्मन्! भगवान नारायण को छोड़कर हम सभी देवता और दानव बहुत थक गए हैं; किन्तु अभी भी अमृत प्रकट नहीं हो रहा है। समुद्र मंथन आरम्भ हुए बहुत समय बीत चुका है।'   |   mahabharat अध्याय 1.18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  1.18.29-30 
ततो ब्रह्माणमासीनं देवा वरदमब्रुवन्।
श्रान्ता: स्म सुभृशं ब्रह्मन् नोद्भवत्यमृतं च तत्॥ २९॥
विना नारायणं देवं सर्वेऽन्ये देवदानवा:।
चिरारब्धमिदं चापि सागरस्यापि मन्थनम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
तब देवताओं ने वहाँ बैठे हुए वरदाता ब्रह्माजी से कहा - 'ब्रह्मन्! भगवान नारायण को छोड़कर हम सभी देवता और दानव बहुत थक गए हैं; किन्तु अभी भी अमृत प्रकट नहीं हो रहा है। समुद्र मंथन आरम्भ हुए बहुत समय बीत चुका है।'
 
Then the gods said to the boon-giver Brahma sitting there - 'Brahman! All of us gods and demons, except Lord Narayana, are very tired; but the nectar is still not appearing. A lot of time has passed since the churning of the ocean began.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)