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mahabharat 1.18.22: जब पर्वत घुमाया जा रहा था, तब उसके शिखर पर स्थित बड़े-बड़े वृक्ष आपस में टकराकर उन पर रहने वाले पक्षियों सहित नीचे गिर पड़े ॥22॥   |   mahabharat अध्याय 1.18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.18.22 
तस्मिंश्च भ्राम्यमाणेऽद्रौ संघृष्यन्त: परस्परम्।
न्यपतन् पतगोपेता: पर्वताग्रान्महाद्रुमा:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जब पर्वत घुमाया जा रहा था, तब उसके शिखर पर स्थित बड़े-बड़े वृक्ष आपस में टकराकर उन पर रहने वाले पक्षियों सहित नीचे गिर पड़े ॥22॥
 
When the mountain was being rotated, the large trees on its peak collided with each other and fell down along with the birds living on them. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)