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mahabharat 1.18.16: तदनन्तर देवताओं द्वारा बार-बार खींचे जाने पर वासुकि नाग के मुख से निरन्तर धुआँ और ज्वालाओं सहित गरम श्वास निकलने लगी॥16॥   |   mahabharat अध्याय 1.18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.18.16 
वासुकेरथ नागस्य सहसाऽऽक्षिप्यत: सुरै:।
सधूमा: सार्चिषो वाता निष्पेतुरसकृन्मुखात्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर देवताओं द्वारा बार-बार खींचे जाने पर वासुकि नाग के मुख से निरन्तर धुआँ और ज्वालाओं सहित गरम श्वास निकलने लगी॥16॥
 
Then, as the snake Vasuki was being pulled again and again by the gods, hot breaths along with smoke and flames began to come out of his mouth continuously.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)