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mahabharat 1.18.15: जहाँ भगवान नारायण थे, वहाँ भगवान अनन्तदेव खड़े थे। वे बार-बार वासुकि नाग का सिर उठाकर हिला रहे थे॥ 15॥   |   mahabharat अध्याय 1.18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.18.15 
अनन्तो भगवान् देवो यतो नारायणस्तत:।
शिर उत्क्षिप्य नागस्य पुन: पुनरवाक्षिपत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जहाँ भगवान नारायण थे, वहाँ भगवान अनन्तदेव खड़े थे। वे बार-बार वासुकि नाग का सिर उठाकर हिला रहे थे॥ 15॥
 
Lord Anantadeva was standing where Lord Narayana was. He was repeatedly lifting and shaking the head of Vasuki Naag.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)