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mahabharat 1.18.13-15h: हे ब्रह्मन्! इस प्रकार पूर्वकाल में देवताओं, दानवों और पिशाचों ने मन्दराचल को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर अमृत के लिए क्षीरसागर का मंथन आरम्भ किया। उन महादानवों ने सर्पराज वासुकि का मुख दृढ़ता से पकड़ रखा था और समस्त देवतागण उनकी पूंछ की ओर से उन्हें पकड़कर खड़े हो गए॥13-14॥   |   mahabharat अध्याय 1.18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना  »  श्लोक 13-15h
 
 
श्लोक  1.18.13-15h 
मन्थानं मन्दरं कृत्वा तथा नेत्रं च वासुकिम्।
देवा मथितुमारब्धा: समुद्रं निधिमम्भसाम्॥ १३॥
अमृतार्थे पुरा ब्रह्मंस्तथैवासुरदानवा:।
एकमन्तमुपाश्लिष्टा नागराज्ञो महासुरा:॥ १४॥
विबुधा: सहिता: सर्वे यत: पुच्छं तत: स्थिता:।
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! इस प्रकार पूर्वकाल में देवताओं, दानवों और पिशाचों ने मन्दराचल को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर अमृत के लिए क्षीरसागर का मंथन आरम्भ किया। उन महादानवों ने सर्पराज वासुकि का मुख दृढ़ता से पकड़ रखा था और समस्त देवतागण उनकी पूंछ की ओर से उन्हें पकड़कर खड़े हो गए॥13-14॥
 
O Brahman! In this manner, in the past, the gods, demons and devils started churning the ocean of water for Amrit, using Mandara mountain as the churning rod and Vasuki snake as the rope. Those great demons held firmly the mouth of the king of serpents Vasuki and all the gods stood holding him on the side where his tail was facing.॥13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)