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mahabharat 1.18.12: तब कच्छराज ने 'तथास्तु' कहा और अपनी पीठ मंदराचल के नीचे कर दी। देवराज इन्द्र ने उस पर्वत को अपने वज्र से दबा दिया। 12॥   |   mahabharat अध्याय 1.18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.18.12 
कूर्मेण तु तथेत्युक्त्वा पृष्ठमस्य समर्पितम्।
तं शैलं तस्य पृष्ठस्थं वज्रेणेन्द्रो न्यपीडयत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
तब कच्छराज ने 'तथास्तु' कहा और अपनी पीठ मंदराचल के नीचे कर दी। देवराज इन्द्र ने उस पर्वत को अपने वज्र से दबा दिया। 12॥
 
Then Kachcharaja said 'Tathaastu' and placed his back under Mandarachal. Devraj Indra suppressed that mountain with his thunderbolt. 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)