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mahabharat 1.18.1-4: उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकजी! तत्पश्चात समस्त देवतागण मिलकर उस महान् मन्दराचल पर्वत को उखाड़ने के लिए उसके पास गए। वह पर्वत श्वेत मेघों के समान गगनचुम्बी चोटियों से सुशोभित था। चारों ओर फैली हुई लताओं के समुदाय ने उसे आच्छादित कर रखा था। उस पर नाना प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे थे। वहाँ सर्वत्र बड़े-बड़े दांतों वाले बाघ, सिंह आदि अनेक भयंकर पशु विराजमान थे। उस पर्वत के विभिन्न क्षेत्रों में किन्नरगण, अप्सराएँ और देवता निवास करते थे। उसकी ऊँचाई ग्यारह हजार योजन थी और वह भूमि के नीचे भी उतने ही हजार योजन तक स्थित था। जब देवता उसे उखाड़ न सके, तब उन्होंने वहाँ बैठे हुए भगवान विष्णु और ब्रह्मा से इस प्रकार कहा -॥1-4॥   |   mahabharat अध्याय 1.18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 18: देवताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान‍्का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना  »  श्लोक 1-4
 
 
श्लोक  1.18.1-4 
सौतिरुवाच
ततोऽभ्रशिखराकारैर्गिरिशृङ्गैरलंकृतम्।
मन्दरं पर्वतवरं लताजालसमाकुलम्॥ १॥
नानाविहगसंघुष्टं नानादंष्ट्रिसमाकुलम्।
किन्नरैरप्सरोभिश्च देवैरपि च सेवितम्॥ २॥
एकादश सहस्राणि योजनानां समुच्छ्रितम्।
अधो भूमे: सहस्रेषु तावत्स्वेव प्रतिष्ठितम्॥ ३॥
तमुद्धर्तुमशक्ता वै सर्वे देवगणास्तदा।
विष्णुमासीनमभ्येत्य ब्रह्माणं चेदमब्रुवन्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकजी! तत्पश्चात समस्त देवतागण मिलकर उस महान् मन्दराचल पर्वत को उखाड़ने के लिए उसके पास गए। वह पर्वत श्वेत मेघों के समान गगनचुम्बी चोटियों से सुशोभित था। चारों ओर फैली हुई लताओं के समुदाय ने उसे आच्छादित कर रखा था। उस पर नाना प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे थे। वहाँ सर्वत्र बड़े-बड़े दांतों वाले बाघ, सिंह आदि अनेक भयंकर पशु विराजमान थे। उस पर्वत के विभिन्न क्षेत्रों में किन्नरगण, अप्सराएँ और देवता निवास करते थे। उसकी ऊँचाई ग्यारह हजार योजन थी और वह भूमि के नीचे भी उतने ही हजार योजन तक स्थित था। जब देवता उसे उखाड़ न सके, तब उन्होंने वहाँ बैठे हुए भगवान विष्णु और ब्रह्मा से इस प्रकार कहा -॥1-4॥
 
Ugrashravaji says - Shaunakji! Thereafter all the gods together went near the great mountain Mandaraachal to uproot it. That mountain was adorned with sky-high peaks which appeared like white clouds. A community of creepers spread all around had covered it. All kinds of birds were chirping on it. There were many ferocious animals like tigers, lions etc. with big teeth everywhere. Kinnargans, Apsaras and gods lived in different regions of that mountain. Its height was eleven thousand yojanas and it was established for the same number of thousand yojanas below the ground. When the gods could not uproot it, then they spoke to Lord Vishnu and Brahma sitting there in this manner -॥1-4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)