Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.178.22: पितामह! क्षत्रियों का संहार मत करो। पुत्र! पृथ्वी सहित सातों लोकों का विनाश मत करो। यह जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, यह तुम्हारे तप से उत्पन्न तेज को कलंकित करने वाला है, अतः इसे मार डालो। | mahabharat अध्याय 1.178: पितरोंद्वारा और्वके क्रोधका निवारण । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
मा वधी: क्षत्रियांस्तात न लोकान् सप्त पुत्रक।
दूषयन्तं तपस्तेज: क्रोधमुत्पतितं जहि॥ २२॥
अनुवाद
पितामह! क्षत्रियों का संहार मत करो। पुत्र! पृथ्वी सहित सातों लोकों का विनाश मत करो। यह जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, यह तुम्हारे तप से उत्पन्न तेज को कलंकित करने वाला है, अतः इसे मार डालो।
Father! Do not kill the Kshatriyas. Son! Do not destroy the seven worlds including the earth. This anger that has arisen is going to pollute the brilliance (of your) which is born out of penance, so kill this one.
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वण्यौर्ववारणे अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १७८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें और्वक्रोधनिवारणविषयक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७८॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥