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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 178: पितरोंद्वारा और्वके क्रोधका निवारण  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.178.21 
न चैतन्न: प्रियं तात यदिदं कर्तुमिच्छसि।
नियच्छेदं मन: पापात् सर्वलोकपराभवात्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
बेटा! तुम जो कुछ करना चाहते हो, वह भी हमें प्रिय नहीं है। समस्त लोकों का विनाश करना महान पाप है, इसलिए अपने मन को ऐसा करने से रोको।
 
Son! Whatever you want to do, even that is not dear to us. The destruction of all the worlds is a great sin, so stop your mind from doing that.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)