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mahabharat 1.177.25: बाहर आते ही उस तेजस्वी बालक ने, दोपहर के प्रज्वलित सूर्य के समान, उन क्षत्रियों की आँखों की ज्योति छीन ली। तब वे अंधे होकर उस पर्वत के ऊबड़-खाबड़ स्थानों में भटकने लगे॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 1.177: शक्तिपुत्र पराशरका जन्म और पिताकी मृत्युका हाल सुनकर कुपित हुए पराशरको शान्त करनेके लिये वसिष्ठजीका उन्हें और्वोपाख्यान सुनाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 177: शक्तिपुत्र पराशरका जन्म और पिताकी मृत्युका हाल सुनकर कुपित हुए पराशरको शान्त करनेके लिये वसिष्ठजीका उन्हें और्वोपाख्यान सुनाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.177.25 
मुष्णन् दृष्टी: क्षत्रियाणां मध्याह्न इव भास्कर:।
ततश्चक्षुर्विहीनास्ते गिरिदुर्गेषु बभ्रमु:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
बाहर आते ही उस तेजस्वी बालक ने, दोपहर के प्रज्वलित सूर्य के समान, उन क्षत्रियों की आँखों की ज्योति छीन ली। तब वे अंधे होकर उस पर्वत के ऊबड़-खाबड़ स्थानों में भटकने लगे॥ 25॥
 
As soon as he came out, that radiant child, like the blazing noonday sun, snatched away the light from the eyes of those Kshatriyas. Then they became blind and started wandering in the rugged places of that mountain.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)