श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 177: शक्तिपुत्र पराशरका जन्म और पिताकी मृत्युका हाल सुनकर कुपित हुए पराशरको शान्त करनेके लिये वसिष्ठजीका उन्हें और्वोपाख्यान सुनाना  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  1.177.17-18 
क्षत्रियाणां तदा तात कारणान्तरदर्शनात्।
ततो महीतलं तात क्षत्रियेण यदृच्छया॥ १७॥
खनताधिगतं वित्तं केनचिद् भृगुवेश्मनि।
तद् वित्तं ददृशु: सर्वे समेता: क्षत्रियर्षभा:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
पिता जी! उन्होंने उस समय अन्य कारणों पर विचार करके क्षत्रियों को धन दिया था। पुत्र! उसके बाद एक क्षत्रिय को पृथ्वी खोदते समय अचानक एक भृगुवंशी के घर में गड़ा हुआ खजाना मिल गया। तब सभी श्रेष्ठ क्षत्रिय एकत्रित हुए और उन्होंने उस धन को देखा॥17-18॥
 
Father! After considering some other reasons, he had given wealth to the Kshatriyas at that time. Son! After that, a Kshatriya suddenly found a treasure buried in the house of a Bhriguvanshi while digging the earth. Then all the best Kshatriyas gathered and saw that wealth.॥ 17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)