श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 176: कल्माषपादका शापसे उद्धार और वसिष्ठजीके द्वारा उन्हें अश्मक नामक पुत्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.176.16 
गन्धर्व उवाच
एवमुक्तस्तया हृष्टो वसिष्ठ: श्रेष्ठभागृषि:।
अस्ति संतानमित्युक्त्वा मृत्यो: पार्थ न्यवर्तत॥ १६॥
 
 
अनुवाद
गन्धर्व कहते हैं- अर्जुन! भगवान् पुरुषोत्तम की पूजा करने वाले महर्षि वशिष्ठ, विष्णन्ति के वचन सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और ‘मेरा वंश लुप्त नहीं हुआ है’ ऐसा कहकर उन्होंने प्राण त्यागने का संकल्प त्याग दिया॥16॥
 
Gandharva says- Arjun! Maharishi Vashishtha, who used to worship Lord Purushottam, became very happy after hearing the words of Vishnanti and gave up his resolve to die by saying, 'My lineage has not disappeared.' 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)