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mahabharat 1.176.14: वसिष्ठजी ने पूछा - पुत्री! जैसे मैं पहले शक्ति के मुख से वेदों का उनके अंगों सहित पाठ सुनता था, वैसे ही सांगवेद का पाठ किसके कानों तक पहुँच रहा है?॥14॥   |   mahabharat अध्याय 1.176: कल्माषपादका शापसे उद्धार और वसिष्ठजीके द्वारा उन्हें अश्मक नामक पुत्रकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 176: कल्माषपादका शापसे उद्धार और वसिष्ठजीके द्वारा उन्हें अश्मक नामक पुत्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.176.14 
वसिष्ठ उवाच
पुत्रि कस्यैष साङ्गस्य वेदस्याध्ययनस्वन:।
पुरा साङ्गस्य वेदस्य शक्तेरिव मया श्रुत:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
वसिष्ठजी ने पूछा - पुत्री! जैसे मैं पहले शक्ति के मुख से वेदों का उनके अंगों सहित पाठ सुनता था, वैसे ही सांगवेद का पाठ किसके कानों तक पहुँच रहा है?॥14॥
 
Vasishtha asked - Daughter! Just as I used to hear the recitation of Vedas with their parts from the mouth of Shakti earlier, in the same way, whose recitation of Sang Veda is reaching my ears?॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)