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mahabharat 1.176.10: वहां भी स्वयं को जमीन पर पड़ा देख उन्होंने कहा, 'मैं मर नहीं सकता' और अपने आश्रम वापस चले गए।   |   mahabharat अध्याय 1.176: कल्माषपादका शापसे उद्धार और वसिष्ठजीके द्वारा उन्हें अश्मक नामक पुत्रकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 176: कल्माषपादका शापसे उद्धार और वसिष्ठजीके द्वारा उन्हें अश्मक नामक पुत्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.176.10 
तत: स्थलगतं दृष्ट्वा तत्राप्यात्मानमात्मना।
मर्तुं न शक्यमित्युक्त्वा पुनरेवाश्रमं ययौ॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वहां भी स्वयं को जमीन पर पड़ा देख उन्होंने कहा, 'मैं मर नहीं सकता' और अपने आश्रम वापस चले गए।
 
There too, seeing himself lying on the ground, he said, 'I cannot die' and went back to his ashram.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)