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mahabharat 1.175.47: यद्यपि उस समय अग्नि अत्यन्त प्रज्वलित थी, फिर भी वह उसे जला न सकी। हे शत्रुओं का संहार करने वाले अर्जुन! उसके प्रभाव से वह प्रज्वलित अग्नि भी उसके लिए शीतल हो गई। 47.   |   mahabharat अध्याय 1.175: शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 175: शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  1.175.47 
तं तदा सुसमिद्धोऽपि न ददाह हुताशन:।
दीप्यमानोऽप्यमित्रघ्न शीतोऽग्निरभवत् तत:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि उस समय अग्नि अत्यन्त प्रज्वलित थी, फिर भी वह उसे जला न सकी। हे शत्रुओं का संहार करने वाले अर्जुन! उसके प्रभाव से वह प्रज्वलित अग्नि भी उसके लिए शीतल हो गई। 47.
 
Although the fire was blazing with great intensity at that time, it could not burn him. O Arjuna, the slayer of enemies! Due to his influence, even that blazing fire became cool for him. 47.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)