स मेरुकूटादात्मानं मुमोच भगवानृषि:।
गिरेस्तस्य शिलायां तु तूलराशाविवापतत्॥ ४५॥
अनुवाद
महर्षि वसिष्ठ ने मेरु पर्वत की चोटी से उसी पर्वत की एक चट्टान पर अपने को फेंका; परन्तु ऐसा लगा मानो वे रुई के ढेर पर गिर पड़े हों ॥ 45॥
The great sage Vasishtha threw himself from the peak of Mount Meru onto a rock on the same mountain; but it felt as if he had fallen on a heap of cotton. ॥ 45॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥