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mahabharat 1.175.44: उस समय (अपनी पुत्रवधुओं के दुःख से दुःखी होकर) वशिष्ठजी ने शरीर त्यागने का निश्चय कर लिया; परंतु विश्वामित्र को उखाड़ फेंकने का विचार भी परम बुद्धिमान ऋषि वशिष्ठजी के मन में नहीं आया ॥44॥   |   mahabharat अध्याय 1.175: शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 175: शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.175.44 
चक्रे चात्मविनाशाय बुद्धिं स मुनिसत्तम:।
न त्वेव कौशिकोच्छेदं मेने मतिमतां वर:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
उस समय (अपनी पुत्रवधुओं के दुःख से दुःखी होकर) वशिष्ठजी ने शरीर त्यागने का निश्चय कर लिया; परंतु विश्वामित्र को उखाड़ फेंकने का विचार भी परम बुद्धिमान ऋषि वशिष्ठजी के मन में नहीं आया ॥44॥
 
At that time (being saddened by the grief of his daughters-in-law) Vashishtha decided to give up his body; But the idea of uprooting Vishwamitra did not even come to the mind of the wisest sage Vashishtha. 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)